आरबीआई ने बैंक एक्विजिशन फाइनेंसिंग सीमा को दोगुना कर 20% किया

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने शुक्रवार को वाणिज्यिक बैंकों को पहली बार मर्जर और एक्विजिशन (एमएंडए) के लिए फाइनेंसिंग की अनुमति देते हुए अंतिम दिशानिर्देश जारी किए। उद्योग की मांग पर मूल प्रस्तावित 10% सीमा को दोगुना कर बैंकों के योग्य पूंजी आधार का 20% कर दिया गया है। ये नियम 1 अप्रैल 2026 से लागू होंगे।

ड्राफ्ट नियमों से मुख्य बदलाव

नए फ्रेमवर्क के तहत बैंक अब एक्विजिशन मूल्य का 75% तक फाइनेंस कर सकेंगे, जबकि एक्वायरिंग कंपनी को कम से कम 25% इक्विटी खुद के फंड से लगानी होगी। अक्टूबर 2025 के ड्राफ्ट में 70% की सीमा प्रस्तावित थी। लिस्टेड कंपनियों के लिए पिछले तीन साल का मुनाफा और न्यूनतम 500 करोड़ रुपये का नेट वर्थ जरूरी है, जबकि अनलिस्टेड के लिए BBB- या इससे ऊपर का क्रेडिट रेटिंग। सभी लेन-देन में एक्वायरिंग कंपनी से कॉर्पोरेट गारंटी अनिवार्य होगी।

खुदरा निवेशकों के लिए बढ़ी सीमाएं

एक्विजिशन फाइनेंसिंग के साथ ही खुदरा निवेशकों के लिए लोन सीमाएं बढ़ाई गईं। शेयरों के खिलाफ लोन अब प्रति व्यक्ति 1 करोड़ रुपये तक (पहले 20 लाख), जबकि आईपीओ फाइनेंसिंग 25 लाख रुपये तक (पहले 10 लाख)। लिस्टेड शेयरों पर 60%, म्यूचुअल फंड्स/ईटीएफ पर 75% और डेट म्यूचुअल फंड्स पर 85% लोन-टू-वैल्यू रेशियो तय किया गया।

जोखिम प्रबंधन के सुरक्षा उपाय

सिस्टमिक रिस्क रोकने के लिए बैंकों की कुल कैपिटल मार्केट एक्सपोजर टियर-1 कैपिटल का 40% और डायरेक्ट एक्सपोजर 20% सीमित रहेगा। एक्विजिशन के बाद डेट-टू-इक्विटी रेशियो 3:1 से अधिक नहीं होगा। पहले भारतीय बैंक कॉर्पोरेट टेकओवर फाइनेंसिंग से वंचित थे, अब एसबीआई चेयरमैन सीएस सेट्टी जैसे नेताओं की लॉबिंग के बाद ये बदलाव आया।

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